रीति रिवाज

0
1990

भारत में कुछ ऐसे रीति रिवाज है जिनकी प्रसांगिकता वर्तमान में अब कुछ नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे भी रीति- रिवाज है जिनका बढ़ावा देने से हमारे भारतीय संस्कृत के लिए वरदान साबित होगा

हिंदू धर्म में ऐसे बहुत से रीति-रिवाज है जो अब महत्व के नहीं है। क्योंकि भले ही भूतपूर्व में इन रीति- रिवाज का महत्व रहा हो। लेकिन बदलते परिदृश्य में इन रीति-रिवाजों का कोई महत्व नहीं रह गया है। हमारा भारतीय समाज एक वैविध्य समाज है। जहां पर अनेक भाषायी और अनेक धर्म और इसके अलावा अनेक प्रजातियों के लोग रहते हैं। इसीलिए हमारे भारत को विविधता में एकता वाला देश भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि हम सब कहीं न कहीं एक दूसरे से रीति-रिवाजों के माध्यम से जुड़े हुए हैं जो उन्हें भाषा और प्रजाति से ऊपर उठाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे रीति रिवाज है जैसे कि नरबलि और धड़ीचा प्रथा और इसके अलावा देवदासी प्रथा, मूर्ति पूजा ,सती प्रथा इन सब Riti Riwaj को अब बंद कर देना चाहिए। क्योंकि इन सब रीति-रिवाजों की प्राचीन समय में परिस्थितियों के अनुसार इनकी समाज में आवश्यकता थी। लेकिन बदलते समाज में इन रीति-रिवाजों से समाज में हस्तक्षेप हो रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप समाज में कहीं ना कहीं किसी न किसी व्यक्ति के अंदर इन रीति-रिवाजों को खत्म करने के लिए प्रयास तो किया जा रहा है। लेकिन जो बुजुर्ग लोग हैं वह रीति रिवाज के अनुसार ही अपना जीवन यापन करना चाहते हैं। लेकिन हम आज इस विषय पर चर्चा करने वाले हैं कौन-कौन से रीति रिवाज को खत्म कर देना चाहिए और कौन-कौन से रीति रिवाज को अपनाने से हमारे चरित्र में विनम्रता, करुणा परोपकार ,दया और सहनशीलता की भावना आती है।

रीति- रिवाज क्या होता है?

रीति- रिवाज की उत्पत्ति समाज में रहन सहन और लोक कथाओं और भोजन से संबंधित होता है। रीति रिवाज समाज की ऐसी परंपरा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कार के रूप में या त्यौहार के रूप में स्थानांतरित होती रही है। रिवाज एक उर्दू शब्द है। रिवाज का हिंदी शब्द होगा परंपरा। लेकिन कुछ ऐसे रीति रिवाज है जिन्हें बदलने की आवश्यकता है। जिनकी आवश्यकता अब समाज के लिए ठीक नहीं है।

भारत में ऐसे कौन-कौन से Riti Riwaj है जिन्हें अब बदल देना चाहिए

(1) धड़ीचा प्रथा

मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में धड़ीचा प्रथा अभी वर्तमान में विद्यमान है। धड़ीचा प्रथा एक ऐसी प्रथा होती है जिसमें किसी अपरिचित व्यक्ति के लिए 1 महीने या 1 साल या 2 साल के लिए नकली वाइफ बनना रहता है। अर्थात कहने का मतलब यह है इसे वाइफ ऑन रेंट भी बोलते हैं। आप मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में जाएंगे वहां पर आपको देखने के लिए यह प्रथा मिल जाएगा। वहां के लोगों को यह विश्वास है कि यह प्रथा उनके आय का एक प्रमुख साधन भी है और साथ ही साथ इससे समाज में संतुलन भी रहता है। शिवपुरी जिले में स्त्रियों की खरीद-फरोख्त होती है। लेकिन प्रशासन के कानों में जूं तक भी नहीं  रेंगती है क्योंकि जो भी प्रशासन का व्यक्ति इस प्रथा के लिए आवाज उठाता है या तो उसका तबादला कर दिया जाता है। या तो हमेशा -हमेशा के लिए उसकी बोली बंद कर दी जाती है। चाहे रिश्वत के माध्यम से चाहे धमकाकर या धमकाने सी भी ना माने तो जान से मार दिया जाता है।

धड़ीचा प्रथा

(2) देवदासी प्रथा

देवदासी प्रथा एक ऐसा प्रथा है जो प्राचीन काल से चला आ रहा है। यह प्रथा दक्षिण भारत में विद्यमान है। इस प्रथा के नियमों के अनुसार देवदासी वह महिला होती है जो समाज द्वारा तिरस्कृत हो या अजीवन विवाह नहीं करना चाहती हो। वह महिला अपने आप को मंदिरों के कार्यों के लिए समर्पित कर देती है जैसे मंदिरों में नृत्य करना मंदिर की साफ सफाई करना जो महिलाएं देवदासी प्रथा अपनाती हैं। उनसे घर से कोई सम्बन्ध नही रह जाता है। समस्या यह है कि इस देवदासी प्रथा की आड़ में पुजारी लोग जबरन देवदासी महिलाओं से शारीरिक संबंध बनाते हैं। समय के साथ यह प्रथा बहुत दूषित हो चुका है। जिसमें महिलाओं का बहुत ज्यादा योन उत्पीड़न हो रहा है। सरकार इस पर कानून भी बना चुकी है । यह प्रथा यदि किसी मंदिर में देखने को मिल जाता है तो इस मंदिर का संचालन प्रशासन करेगा और उस पुजारी को अपदस्थ कर दिया जाएगा। आप यदि इस प्रथा को देखना चाहते हैं तो आप तेलंगाना, केरल और आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में देख सकते हैं।

(3) सती प्रथा

सती प्रथा का उल्लेख हमें सबसे पहले महाभारत में मिलता है। जिसमें घतत्वकच्छ की पत्नी  घतत्वकच्छ के साथ सती हो जाती है। और पांडु की पत्नी माधुरी भी पांडु की चिता पर बैठकर आत्मदाह कर लेती है। ऐसा महाभारत में साक्ष्य मिलता है। यह प्रथा भी आपको राजस्थान में देखने को मिल जाएगा। इस प्रथा के तहत यदि किसी विवाहित महिला का पति का अकस्मात मृत्यु हो जाती है। जिसके परिणाम स्वरूप पति की चिता पर उस महिला को भी जला दिया जाता है पति के साथ ही। देखिए यह प्रथा भले ही मध्य काल के भारत में महत्वपूर्ण रहा हो लेकिन अभी वर्तमान में इसकी कोई प्रसंगिकता नहीं है। क्योंकि मध्यकाल में अनेक आक्रांता जैसे अलाउद्दीन खिलजी और तैमूर लंग मोहम्मद गोरी जैसे लोग ना केवल युद्ध जीतते थे युद्ध के परिणाम स्वरूप हिंदू महिलाओं के साथ जबरन शारीरिक संबंध भी बनाते थे और उनके साथ जानवरों के जैसा व्यवहार करते थे। आपने मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत अवश्य ही पड़ी होगी। पद्मावत में रानी पद्मावती का जिक्र मिलता है जिसमें रानी पद्मावती राणा रतन सिंह की मृत्यु के पश्चात वह भी आग में कूदकर अपनी जान देती है। सती प्रथा को ही राजस्थान में जौहर प्रथा के नाम से जाना जाता है।

riti riwaj

(4) नरबलि प्रथा

नरबलि प्रथा कोलकाता और बिहार के कुछ पिछड़े क्षेत्रों में देखने के लिए मिल जाता है। जहां पर तांत्रिक लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी नवजात शिशु के खून से अपने देवता को प्रसन्न करते हैं। कहीं-कहीं ऐसा भी देखने मिल जाता है कि कोई व्यक्ति यदि अपना मनोरथ सिद्ध करना चाहता है तो वाह पाखंडी तांत्रिक के बहकावे में आकर अपने पुत्र या पुत्री का बलि दे देता है। जिससे उसका मनोरथ सिद्ध हो जाए। यह एक ढकोसला है इससे कुछ नहीं होता है इसको भी बदल देना चाहिए।

(5) छुआछूत की प्रथा

भारतीय संविधान के अनुसार छुआछूत का अंत है। इसका जिक्र मूल अधिकार के अनुच्छेद 17 में है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति से छुआछूत करता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे सरकार के कानून के अनुसार सजा मिलेगी। नागरिक संरक्षण अधिनियम 1976 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी भी दलित व्यक्ति को जातिसूचक शब्दों से सूचित करता है या दलित व्यक्ति की मूंछ रखने पर कोई सवर्ण उसका उपहास करता है। किसी शुद्र  व्यक्ति के सार्वजनिक कुएं पर पानी लेने से मना करता है तो उस व्यक्ति को 3 वर्ष की सजा मिली जाए दी जाएगी वह भी गैर जमानती और  सश्रम कारावास के साथ। ध्यान देने वाली बात यह है कभी-कभी छुआछूत के नाम पर सवर्ण व्यक्ति दलित व्यक्तियों के साथ अवैमनस्य का  व्यवहार करते है।

(6) जादू टोना की प्रथा

जादू टोना के नाम पर स्त्रियों के साथ बहुत ज्यादती हो रही। उनके साथ यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसी घटनाएं घटती रहती है। कभी-कभी कोई तांत्रिक जादू टोना की आड़ में किसी महिला के साथ अपनी हवस को मिटाता है। इसलिए इस जादू टोना की प्रथा को अब समाप्त कर देना चाहिए इसमें कोई सच्चाई नहीं है।

जादू टोना की प्रथा
(7) ग्रह नक्षत्रों को मानना

ग्रह नक्षत्रों के अनुसार जीवन यापन करना सबसे बड़ी मूर्खता पूर्ण बात है। क्योंकि वैज्ञानिक ने खारिज कर दिया है कि आपके जीवन में ग्रह नक्षत्रों का कोई योगदान नहीं है। लेकिन कई ज्योतिषी ग्रह नक्षत्रों के नाम पर व्यक्तियों से मोटी मोटी रकम ऐंठते हैं।

भारत में किन-किन रीति-रिवाजों को बढ़ावा देना चाहिए

(1) हाथ जोड़कर अभिवादन करना-

हाथ जोड़कर अपने बड़ों का अभिवादन करना चाहिए इससे आपके अंदर राग-द्वेष और अहंकार की भावना दूर होगी और आपके अंदर दया करुणा और परोपकार इसके अलावा सेवा भावना के गुण विकसित होंगे।

(2) अपने से बड़ों का पैर छूना-

  बच्चों को सिखाया भी जाता है कि अपने से बड़ों के पैर छूना चाहिए। इससे उनका आशीर्वाद मिलता है आशीर्वाद मिलने से आपका जीवन सुख समृद्धि से परिपूर्ण हो जाता है

(3) माथे पर तिलक लगाना-

  माथे पर तिलक लगाने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास होता है

(4) नदी में सिक्का फेंकना-

हमारे भारतीय संस्कृत में नदी में सिक्का इसलिए फेंकना शुभ माना जाता है। क्योंकि इस सिक्के से मल्लाह की कि आजीविका चलती है। इसलिए प्राचीन काल से नदी में सिक्का फेंकने की परंपरा चली आ रही है। अब आपके मन में प्रश्न रहा होगा कि एक सिक्के से कैसे मल्लाहों की आजीविका चलेगी आपको बता दे की यदि करोड़ों हिंदू प्रतिदिन आते जाते नदी में सिक्का फेंकते हैं तो उस सिक्के को मल्लाह चुंबक के माध्यम से नदी से बाहर निकाल लेते हैं और सिक्का को एकत्र करके अपने आवश्यकता की वस्तुओं सेवाओं को खरीदकर करके उपभोग करते हैं। एक कारण यह भी है कि प्राचीन काल में नदी में तांबे के सिक्के फेंके जाते थे जिससे नदी का पानी बैक्टीरिया मुक्त हो जाता था।

(5) उत्तर दिशा में सिर रखकर सोना नहीं चाहिए

 उत्तर दिशा में सिर रखकर नहीं सोना चाहिए क्योंकि उत्तर दिशा में मृत व्यक्ति का शव रहता है। विज्ञान के अनुसार उत्तर दिशा में सिर रख करके इसलिए नहीं सोना चाहिए क्योंकि उत्तर दिशा में चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। जिसके परिणाम स्वरूप नार्थ पोल में ग्रेविटेशनल फोर्स ज्यादा लगता है। जिसके परिणाम स्वरूप ब्रेन हेमरेज होने की प्रायिकता बढ़ जाती है।

(6) मंदिर में घंटा बजाना

मंदिर में घंटा बजाने से अध्यात्म का अनुभव होता है। इसका कारण यह है कि जब आप मंदिर में घंटा बजाते हैं जो इसकी ध्वनि होती है हमारे कानों में सातों चक्र को जागृत कर देती है। जिसके परिणाम स्वरूप हमारे अंदर से नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

(7) पैर की अंगुली में अंगूठी पहनना

पैर की अंगुली में अंगूठी पहनने से महिलाओं को यह फायदा होता है कि उनको भविष्य में गर्भाशय और हार्ट से जुड़ी जो प्रॉब्लम होती है वह प्रॉब्लम उनको कभी भी नहीं होगी। 

निष्कर्ष:

रीति रिवाज भारतीय संस्कृत का अहम हिस्सा है। यह भारतीय संस्कृत को अनूठा बनाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे रीति- रिवाज है जिनका महत्व अब नहीं रह गया है और यह रीति रिवाज समाज में हस्तक्षेप कर रहे हैं। इसलिए इन रीति-रिवाजों को हटा देना चाहिए और उपर्युक्त रीति-रिवाजों को अच्छी तरह से पालन करना चाहिए।

FAQ:

(1) रीति रिवाज क्या है?

पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होने वाले संस्कार को ही Riti Riwaj कहा जाता है।

(2) रीति का अर्थ क्या होता है?

रीति का अर्थ होता है ढंग या तरीका।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here