जानिए आधुनिक काल की उत्तम स्थापत्य कला को पेश करने वाली पटवों की हवेली के इतिहास के विषय में

0
1557
Patwon ki Haveli ka Itihas

Patwon ki Haveli ka Itihas: दोस्तों आज मैं ऐसे हवेली के विषय में बताने वाला हूं जिस हवेली को देखकर के आप हैरतअंगेज में पड़ जाएंगे कि यह हवेली अपने आप में हड़प्पा सभ्यता का परिचायक है। यदि आप हड़प्पा सभ्यता के स्थल का आनंद उठाना चाहते हैं। तब आप जैसलमेर अवश्य जाइए और जैसलमेर में पटवों की हवेली देखिए। जो पटवों की हवेली है यदि आप उसे देखेंगे तो आप अचरज में पड़ जाएंगे क्योंकि वहां के निवासी बोलते हैं कि यह हवेली अफीम के पैसे से बनाई गई है। क्योंकि इस हवेली को बनाने के लिए कोई आम आदमी या व्यापारी इसके खर्चे को वाहन ही नहीं कर सकता। क्योंकि इस हवेली की जो विशेषता है।विशेषता वह है कि इसमें आपको वायु आपूर्ति और जल निकासी की व्यवस्था और सुंदर बरामदे नक्काशी किए हुए यह सुंदर-सुंदर दृश्य आपको देखने मिल जाएंगे जो लाल बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित हुए हैं। यदि आप घूमने का मूड बना ही रहे हैं तो आप जाइए मात्र ₹100 टिकट है कोई ज्यादा भी टिकट नहीं लग रहा है। यानी कि फुल पैसा वसूल है।

अब जानिए अफीम के पैसे से निर्मित Patwon ki Haveli ka Itihas क्या है?

यदि आप पटवों की हवेली के इतिहास के विषय में जानना चाहते हैं तो इसका इतिहास आज से लगभग 200 से लेकर के 250 साल पुराना है। यह हवेली अस्तित्व में 1805 ईस्वी में आई थी तो इस हवेली को बनवाने का श्रेय अफीम के विक्रेता और इसके अलावा सोने, चांदी के आभूषणों से निर्मित अंगूठी और पायल मांग टीका हार बेचने वाले प्रसिद्धि कारोबारी गुमान चंद्र पटवा ने इस हवेली के परिसर का निर्माण करवाया था। इतिहासकारों की मानें तो इस हवेली को बनने में पूरा 60 वर्ष का समय लगा था और ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है। इन 60 वर्षों में लगभग हवेली का खर्च कुल 1000 करोड़ों पर आया था। क्योंकि इस हवेली को बनाने में जो लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है वह लाल बलुआ पत्थर मध्यकाल से आधुनिक काल तक इसकी मांग ज्यादा हो गई क्योंकि मध्यकाल में आप देखेंगे कि जो भी शासक हुआ करता था। वह अधिकतर अपना किला और मकबरा में उपयुक्त होने वाला पत्थर लाल बलुआ पत्थर ही था। आप अगर ऐसा देखना चाहते हैं तो नई दिल्ली में शाहजहां द्वारा निर्मित लाल किला को देख सकते हैं। जिसमें पूरा लाल बलुआ पत्थर का ही उपयोग हुआ है। कहा जाता है कि जब पटवा बन्धुओं को व्यापार में घाटा हो रहा था इस घाटे के होने के परिणाम स्वरूप जैन आचार्य ने जैसलमेर को छोड़ने की बात कही हालांकि उनके कथनानुसार जैसलमेर को छोड़ दिए लेकिन कालांतर में जब उनका मुनाफा होने लगा तब वह फिरा आकर जैसलमेर में बस गए और अर्जित किए गए धन का उपयोग उस पटवों का हवेली निर्माण करवाया।

Patwon ki Haveli ka Itihas

पटवों की हवेली का स्थापत्य कला क्या है?

पटवों की हवेली का स्थापत्य कला यह है कि इस में उपयोग होने वाले जो पत्थर है वह लाल बलुआ पत्थर है। लेकिन इसका जो पोर्टिको बनाया गया है। उस पोर्टिको को लकड़ी से बनाया गया है। लेकिन लकड़ी की होने के बावजूद भी इसमें जो नक्काशी की गई है। वह काफी काबिले तारीफ है। यदि आप हवेली के अंदर जाएंगे तब आपको एक सुंदर सा अपार्टमेंट दिखेगा। जिसकी दीवारों पर सुंदर-सुंदर प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण किया गया है। इसके अलावा इसके झरोखे और प्रवेश द्वार और दरवाजा भी बहुत ही सुंदर है। हवेली की विशेषता यह है कि इसके अंदर पांच हवेली निहित है अर्थात यह 5 मंजिला है। लेकिन आप यदि हर मंजिल का मुआयना करेंगे तो वह आपको ऐसा एहसास होगा कि हर मंजिल अपने आप में एक हवेली है। हवेली को बनाते समय ध्यान रखा गया था कि हवेली के अंदर हवा का प्रवेश कैसे होगा और इसके अलावा जल निकासी कैसे होगी जल जल निकासी की बात करें तो तो जल निकासी का सिस्टम अभी वर्तमान में जो सिस्टम है जल निकासी की वही व्यवस्था को हवेली के अंदर देखने को मिलेगी इतना ही नहीं इस हवेली के अंदर आपको 60 से अधिक बालकनी देखने को मिल जाएंगे।

पर्यटकों की दृष्टिकोण से पटवों की हवेली के अंदर देखे जाने वाले दृश्य कौन-कौन से हैं?

(1) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का जो  कम्प्लेक्स है। वह अपने आप मे ही पटवों की हवेली के अंदर के कंपलेक्स में देखने को मिल जाएगा। जहां पर जाकर के पर्यटक अपने अतीत से संबंधित जो जानकारियां जैसे चित्रकला और प्राचीन काल के इतिहास में लोगों का जीवन शैली क्या है। उसका विस्तार से जानकारी आपको मिल जाएगी।

(2) पर्यटकों के लिए कौतूहल का विषय यह भी बन सकता है कि इसका जो मेहराब और झरोखा और अपार्टमेंट के अंदर जो कंपलेक्स है और उसकी जो नक्काशी की गई है। उसको देखकर ऐसा एहसास होता है कि उस समय कौन सी एस टेक्नोलॉजी रही होगी जितनी बारीकी से नक्काशी की है।

(3) राजस्थान की डायवर्सिटी अर्थात राजस्थान में रहने वाले लोगों की जीवन शैली क्या है अर्थात राजस्थान के लोग क्या खाते हैं? क्या पीते हैं? कैसे नाचते हैं? उनके यहां शादियां कैसे होती है?आदि जानकारी आपको राजस्थान के इस पटवों की हवेली में देखने को मिल जाएगी।

(4) पटवों की  पांचों हवेली में से जो पहली हवेली है उसकी स्थापत्य कला की प्रशंसा पर्यटक ज्यादा करते हैं। इसका कारण यह है कि फर्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन और बाकी के अन्य चार उसके स्वरूप की भांति दिखते हैं।

पटवों की हवेली को देखने के लिए कौन सा समय सबसे उपयुक्त है?

पटवों की हवेली देखने की बात आती है यदि आप इस हवेली को देखना चाहते हैं तो सबसे अच्छा मौसम शीतकालीन का मौसम रहेगा क्योंकि पटवों की हवेली जैसलमेर में स्थित है ।आपको याद होना चाहिए कि जैसलमेर में रेत ही रेत है और दिन के समय बहुत गर्म हो जाते हैं और जिससे वहां का आसपास का वातावरण भी काफी गर्म हो जाता है। इसलिए आपको गर्मी के मौसम में जाना वहां अच्छा नहीं होगा। यदि आपको गर्मी के मौसम में ही जाना है तो आप कुछ सावधानियां बरतकर के जा सकते हैं जैसे कि आपको जब जाना है तो बिना टोपी और चश्मा लगाए मत जाइए।

निष्कर्ष:

पटवों की हवेली अपनी सुंदर नक्काशी ,बालकनी ,प्रवेश द्वार और इसके अंदर जो मेहराब का उपयोग हुआ है इसे अन्य हवेली से अतुलनीय बनाते हैं।

FAQ:

(1) पटवों की हवेली कहां स्थित है?

पटवों की हवेली भारत के राजस्थान राज्य के जैसलमेर जिले में स्थित है।

(2) पटवों की हवेली का निर्माण का श्रेय किसे दिया जाता है?

पटवों की हवेली का निर्माण का श्रेय गुमान चंद्र पटवा को दिया जाता है।

(3) गुमान चंद्र पटवा कौन थे?

गुमान चंद पटवा अपने समय के एक प्रसिद्ध कारोबारी थे जो सोने चांदी की नक्काशी की गई पतले पतले धागे को स्त्री के परिधानों में लगाते थे।

(4) पटवों की हवेली क्यों प्रसिद्ध है?

पटवों की हवेली इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यह हवेली आधुनिक काल का सबसे अच्छा स्थापत्य कला का नमूना पेश करता है।

(5) सबसे बड़ी हवेली कौन सी है?

सबसे बड़ी हवेली पटवों की हवेली है।

(6) पटवों की हवेली कब बनाई गई थी?

पटवों की हवेली लगभग 18 वीं सदी भी बनाई गई थी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here