दिलवाड़ा जैन मंदिर

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Dilwara Jain Mandir

Dilwara Jain Mandir: जैन धर्म को मानने वाले अनुयायियों के लिए दिलवाड़ा जैन मंदिर एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां आपको जैन धर्म के तीर्थंकरों से संबंधित पांच मंदिर मिल जाएंगे जो इस प्रकार से विमलशाही मंदिर जो जैन तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है। उसके बाद लुनाशाही मंदिर जो नेमिनाथ को समर्पित है। पित्तलहार मंदिर यह मंदिर ऋषभदेव को समर्पित है और उसके बाद ऋषि पार्श्वनाथ मंदिर यह मंदिर पार्श्वनाथ को समर्पित है। उसके बाद अंतिम तीर्थंकर का मंदिर है जिसका नाम है श्री महावीर मंदिर। यह मंदिर अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी को समर्पित है यह मंदिर राजस्थान के सिरोही नामक जिले के दिलवाड़ा नामक गांव में स्थित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें आपको जो बारीकी से तराशे हुए संगमरमर की नक्काशी देखने के लिए मिल जाएगी जो इसकी भव्यता के साथ इसके आकर्षण को दर्शाते हैं। दिलवाड़ा के जैन मंदिर को देखने के लिए देश विदेश के कोने-कोने से पर्यटक आते हैं और इसकी भव्यता को देखकर लुफ्त उठाते हैं।

आइए अब जानते हैं कि आखिरकार इस भव्य मंदिर दिलवाड़ा जैन मंदिर का इतिहास क्या है?

दिलवाड़ा का जैन मंदिर का इतिहास लगभग आज से हजारों वर्ष पुराना है। इस मंदिर का निर्माण चालुक्य शासक वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाइयों ने 11 वीं सदी से लेकर 12 वी सदी के बीच में करवाया है। अब बात आती है इसके तथ्यों की तो आपको बता दें क्योंकि इसके विषय में एग्जैक्ट सन की जानकारी नहीं है कि कौन सी सन में इसका निर्माण किया गया था। लेकिन इतिहासकारों की मानें तो इसका निर्माण लगभग 1100 से  1300 के बीच हुआ है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें जो गोपुरम और परकोटा और इसके अलावा जो छत्र बना है और इसके अलावा सफेद रंग की संगमरमर से जो इसकी दीवाल बनाए गए हैं वह काफी भव्य है। मध्यकाल में इस प्रकार की भव्यता आपको कहीं और नहीं देखने को मिलेगी। हालांकि यदि आप ताजमहल की बात करें तो तो ताजमहल लगभग 1639 ईसवी में बना था। लेकिन ताजमहल की तुलना में भी यह मंदिर काफी सुंदर भी है।

Dilwara Jain Mandir

दिलवाड़ा जैन मंदिर का स्थापत्य कला क्या है?

यदि आप इसकी स्थापत्य कला की बात करेंगे तो इसकी स्थापत्य कला को जानकर आप हैरान हो जाएंगे क्योंकि संगमरमर के पत्थर पर उकेरी गई इतनी बारीकी नक्काशी आज के आधुनिक युग में लोगों को हैरतंगेज में डाल देते हैं कि यह नक्काशी कैसे की गई थी। क्योंकि उस समय ना इतनी कोई टेक्नोलॉजी विकसित हुई थी और ना ही कारीगरों के पास पर्याप्त कौशल था। लेकिन जो भी हो। सच्चाई यह है कि इसका स्थापत्य कला भारतीय संस्कृत के गौरव की गाथा देश विदेशों में भी है। यदि आप संगमरमर के पत्थरों को देखेंगे वहां पर चढ़ती हुई बेल की लताएं और जालीनुमा नक्काशी से सजे तोरण प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की आंखें हीरे की और उनके गले में बहुमूल्य रत्नों से जड़े माला है और इतना ही नहीं इसकी डिजाइन भी बहुत ही सुंदर है। दिलवाड़ा जैन मंदिर में 48 का स्तंभ है पांचों मंदिरों को मिला करके। जिसमें विभिन्न नृत्य मुद्रा में नाच करते हुए नृत्यांगना की छाया चित्रण भी हुआ है। मंदिर का मुख्य आकर्षण का केंद्र इसका रंग मंडप है जो गुंबद के आकार की छत है। इसमें झूमर का ढांचा बना हुआ है जिसमें देवी-देवताओं की प्रतिमाएं चित्रित हुई है।

Dilwara Jain Mandir के भीतर बने पांच मंदिरों की विशेषता क्या है?

(1) प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित विमल वशाही मंदिर

सोलंकी शासक विमल शाह द्वारा 1031 ईस्वी में निर्मित विमल वाशाही मंदिर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है। जिन्हें आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसको बनने में लगभग 14 वर्ष लगा था। यदि इस मंदिर के स्थापत्य कला के बारे में बात करें तो मंडल, छत, दरवाजे बहुत ही आकर्षित करते हैं। इसकी दीवारों पर बने भित्ति चित्र कमल के फूलों की पंखुड़ियां इतनी बारीकी से नक्काशी की गई है जैसे मानो यह अभी सुबह-सुबह खिली हुई प्रतीत होती है। विमल वशाही मंदिर खुले प्रांगण में स्थित है इस खुले प्रांगण के गलियारे में छोटी-छोटी मूर्तियां अन्य जैन तीर्थंकर की बनी हुई है।

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव

(2) 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित लूना वशाही मंदिर

लूना वशाही मंदिर का निर्माण सन 1230 ईस्वी में वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाइयों ने करवाया था। इस मंदिर की स्थापत्य कला की बात करें तो इसके रंग मंडप में लगभग 72 तीर्थंकरों की आकृतियां बनी है और 360 वृक्षों की आकृतियां बनी हुई है और हाथीशिला का भी चित्रांकन हुआ है।

(3) प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित पित्तलहार का मंदिर

भीम सेठ द्वारा निर्मित पित्तलहार का मंदिर प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें ऋषभदेव की जो विशाल मूर्ति बनी है। वह पंचधातु से बनी हुई है और इसके अलावा एक पीतल की भी बनी हुई मूर्ति है इसकी और एक विशेषता यह भी है कि इसके अंदर गर्भगृह और गुड मंडप और नौ चौकी भी है।

(4) 23 वे तीर्थंकर पार्स्वनाथ मंदिर को समर्पित पार्श्वनाथ मंदिर

1459 ईस्वी में श्री मंडली द्वारा 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण हुआ। इस मंदिर का नाम पारसनाथ मंदिर ही रखा गया पार्स्वनाथ के नाम पर ।इस मंदिर की विशेषता यह है कि दिलवाड़ा जैन मंदिर के भीतर स्थित पांच मंदिर की इमारतों में से सबसे ऊंचा मंदिर है। इस मंदिर में 4 हाल हैं उन चारों हालो में की दीवारों पर जो नक्काशी हुई है वह नक्काशी ग्रे बलुआ पत्थर से की गई है।

(5) अंतिम और 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर को समर्पित महावीर स्वामी मंदिर

जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर या 24 वे तीर्थंकर भगवान

महावीर स्वामी को समर्पित महावीर स्वामी मंदिर की विशेषता यह है कि यह पांचों मंदिरों में से सबसे छोटा मंदिर है। लेकिन इसकी विशेषता यह है कि यह सिरोही की कलाकारों के कला को प्रदर्शित करता है।

भगवान महावीर
निष्कर्ष:

दिलवाड़ा जैन मंदिर जैन धर्म की मानने वाले अनुयायियों के लिए मक्का मदीना से कम नहीं है क्योंकि इस मंदिर में आपको प्रथम तीर्थंकर और अंतिम तीर्थंकर का एक साथ दर्शन करने के लिए मिल जाएगा।

FAQ:
(1)दिलवाड़ा जैन मंदिर बंद होने और खुलने का समय क्या है?

जैन धर्म के अनुयायियों के लिए यह मंदिर सुबह 6:00 बजे से लेकर के शाम के 6:00 बजे तक खुला रहता है। लेकिन अन्य धर्मों को मानने वाले अनुयायियों के लिए या पर्यटको के लिए दोपहर 12:00 बजे से लेकर की शाम के 6:00 बजे तक खुला रहता है।

(2) दिलवाड़ा जैन मंदिर का प्रवेश शुल्क कितना है?

दिलवाड़ा जैन मंदिर का कोई भी प्रवेश शुल्क नहीं है अर्थात इसका प्रवेश शुल्क ₹1 भी नहीं है।

(3) दिलवाड़ा जैन मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

दिलवाड़ा जैन मंदिर यदि आप जाना चाहते हैं तो आपको बताना चाहता हूं कि अप्रैल से जून के महीने मत जाइए। क्योंकि उस समय तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक रहता है और शेष के महीने में आप जा सकते हैं क्योंकि मौसम अनुकूल रहता है।

(4) दिलवाड़ा जैन मंदिर के आसपास घूमने लायक जगह कौन कौन से हैं?

दिलवाड़ा जैन मंदिर के आसपास घूमने लायक जगह माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य,नक्की झील,गुरु शिखर,गौमुख मंदिर,अर्बुदा देवी मंदिर,ट्रेवर टैंक,टॉड रॉक,श्री रघुनाथ मंदिर,यूनिवर्सल पीस हॉल,सूर्यास्त बिंदु,अचलगढ़ क़िला आदि स्थान है जहां पर आप जाकर कि ना केवल घूम सकते हैं अपितु अध्यात्म का अनुभव भी कर सकते हैं।

(5) दिलवाड़ा जैन मंदिर कहां है?

दिलवाड़ा जैन मंदिर राजस्थान की सिरोही जिले की दिलवाड़ा नामक स्थान पर है।

(6) दिलवाड़ा जैन मंदिर कैसे जाएं?

दिलवाड़ा जैन मंदिर जाने के लिए आप बस रेल या हवाई जहाज के माध्यम से भी जा सकते हैं बशर्ते नियर बाई एयरपोर्ट को ध्यान में रखकर के हवाई जहाज का टिकट बुकिंग करना है जैसे कि दिलवाड़ा जैन मंदिर जाने के लिए यदि आप हवाई जहाज का चुनाव करते हैं तो आपको नियर बाई एयरपोर्ट जयपुर एयरपोर्ट ही पड़ेगा आपको वहां से उतरकर की बस या टैक्सी या कैब की मदद लेना पड़ेगा।

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