जानिए धुलेंडी होली मानाने का इतिहास और इसकी विशेषताएं

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Dhulandi Holi- Your Voice Story

यदि धूल से होली खेली जाए तो कितनी अच्छी बात होगी। क्योंकि उत्तर भारत में धूल से भी होली खेली जाती है। वृंदावन और मथुरा में धूल से खेली जाने वाली होली को धुलेंडी होली (Dhulandi Holi) भी कहते हैं। यह होली अपने आप में बहुत विशेष होली है। क्योंकि इसकी विशेषता का कारण है इसमें मिट्टी का उपयोग हो रहा है। इस होली में मिट्टी को एक व्यक्ति  दूसरे व्यक्ति को लगाया जाता है। और यह सावधानी बरती जाती है कि मिट्टी आंख में ना घुसे और साथ ही साथ इस मिट्टी से आपको कोई समस्या ना उत्पन्न हो। प्राचीन काल में लोग गारा और साथ ही साथ मुल्तानी मिट्टी से होली खेलते थे। मुल्तानी मिट्टी को पूरे शरीर में लगाया जाता था ।जिससे शरीर की चमक भी बढ़ती थी। और पर्व को एक नया रूप मिलता था जिससे होली के पर्व में चार चांद लग जाता था। और इसके बाद तरह – तरह के पकवान जैसे – चन्द्रकला गुजिया और साथ ही साथ भांग का भी सेवन करते है।

धुलेंडी होली का इतिहास क्या है? (Dhulandi Holi ka Itihas Kya Hai)

(1) धुलेंडी होली की शुरुआत त्रेतायुग से मानी जाती है। ऐसी धारणा प्रचलित है कि त्रेता युग के आरंभ में भगवान विष्णु ने धूलिवंदन किया था। तभी से लोग एक दूसरे को धूल लगाने लगे।

(2) एक धारणा यह भी प्रचलित है कि जब महादेव ने अपने त्रिनेत्र से कामदेव को भस्म किया था। तब देवी रति ने महादेव से यह आराधना की थी कि कामदेव को पुनर्जीवित कर दें। लेकिन महादेव ने यह कहा कि कामदेव द्वापर युग में श्री कृष्ण भगवान की बेटे के रूप में पैदा होंगे। जिनका नाम प्रदुम्न हो होगा। महादेव से ऐसा वाक्य सुनकर देवी रति बहुत खुश हुई। जिसके परिणाम स्वरूप आसमान से फूलों की वर्षा होने लगी तभी से धुलेंडी होली की शुरुआत मानी जाती है। ध्यान देने योग्य वाली बात यह है कि इस होली का प्रारम्भ वास्तविक रूप से हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के जलने के खुशी में मनाई जाती हैं।

धुलेंडी होली क्या है? (Dhulandi Holi Kya Hai)

धुलेंडी होली एक दूसरे को धूलि लगाकर खेली जाने वाली होली है। धुलेंडी होली में पानी में रंगों के साथ धूल को भी मिलाया जाता है। और तब लोगों लोगों के ऊपर रंग डाला जाता है। लेकिन प्राचीन काल में धुलेंडी होली के दिन टेशू के फूल के गुलाल का प्रयोग होता था। लेकिन इस टाइम में रासायनिक रंगों का प्रयोग हो रहा है।

धुलेंडी होली का अन्य नाम क्या है? (Dhulandi Holi ke Anya Name)

  1. धूरद्दी
  1. धुरखेल
  1. धूलिवंदन
  1. चैत बदी

धुलेंडी होली की विशेषता क्या है? (Dhulandi Holi ki Visheshta Kya Hai)

(1) इस होली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धूल का प्रयोग होना बड़ा अनिवार्य है।

(2) इस होली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्राचीन समय में धूल की जगह मुल्तानी मिट्टी और गारा का प्रयोग होता था।

(3) होलिका दहन के बाद धुलेंडी होली प्रारंभ होता है।

(4) इस होली की विशेषता यह है कि लोग एक दूसरे को धूल लगाकर अपनी कटुता को दूर करते हैं और साथ ही साथ गले मिलकर एकता का भाव प्रकट करते हैं।

(5) इस होली की एक विशेषता यह है कि किसी व्यक्ति की मौत हो जाने के बाद उसके घर पर सूखा रंग डाला जाता है।

(6) इस होली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे दया और करूंगा और साथ ही साथ परोपकार की भावना का प्रादुर्भाव होता है। और साथ ही साथ राग -द्वेष और क्रोध का नाश होता है।

(7) इस होली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लोग मिट्टी की सौंधी -सौंधी खुशबू से वाकिफ हो सकते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप अपने वतन की मिट्टी की महत्ता को समझेंगे। आप सब ने रामायण में एक दृश्य जरूर देखा होगा कि राम अयोध्या से जब वनवास की ओर प्रस्थान करते हैं। तब अयोध्या की सीमा से मिट्टी को एक पोटली में लेकर जाते हैं। और उस मिट्टी की प्रतिदिन पूजा करते हैं उससे राम भगवान को एहसास होता था कि मैं अपने राज्य में हूं।

निष्कर्ष:

धुलेंडी होली में धूल का उपयोग करके होली खेला जाता है। इसका इतिहास त्रेता युग से ही माना जाता है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस होली में मिट्टी का गारा और साथ ही साथ मुल्तानी मिट्टी का प्रयोग होता है। जिससे होली में आनंद आ सके और इस होली को खेलने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह अंदर से राग- द्वेष की भावना को दूर करके प्रेम की भावना को समाहित करता है।

सामान्य प्रश्न

(1) धुलेंडी होली इस वर्ष 2022 में कब से प्रारम्भ है?

धुलेंडी होली इस बार 18 मार्च को मनाया जाएगा।

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